ताजमहल का टेंडर’ ने मचा दी धूम, लोग रह गए दंग, देखे हुनर रंग महोत्सव के दूसरे दिन का जलाव

Creation Fashion Lifestyle आजमगढ़ शहर

रिपोर्ट: पद्माकर पाठक

आजमगढ़। रंगमंच एवं ललित कलाओं के क्षेत्र में समर्पित हुनर सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्था द्वारा पिछले 24 वर्षों से लगातार आयोजित हो रहे हुनर रंग महोत्सव के दूसरे दिन शनिवार को उद्धघाटन माँ सरस्वती की प्रतिमा के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन कर पूर्व जिला अध्यक्ष लालगंज भारतीय जनता पार्टी सूरज प्रकाश श्रीवास्तव, वरिष्ठ व्यवसायी अनूप कुमार अग्रवाल, अशोक कुमार अग्रवाल ज्योतिषाचार्य सत्यम गुरु । नें किया।यहआयोजन अग्रसेन महिला महाविद्यालय के प्रांगण मे चल रहा है. आए हुए सभी अथितियों का स्वागत स्वागताअध्यक्ष अभिषेक जायसवाल दीनू, संस्थान अध्यक्ष मनोज यादव ने किया। प्रथम सत्र मे आर. पी. पी. यस.डान्स ग्रुप उत्तराखंड द्वारा मनमोहन गढ़वाली समूह नृत्य की प्रस्तुति से पूरा हाल तालियों गुज उठा। द्वितीय सत्र मे प्रथम नाट्य प्रस्तुति ड्रामाटरजी आर्ट एंड कल्चर सोसायटी दिल्ली द्वारा ‘ताजमहल का टेंडर’ अजय शुक्ला द्वारा लिखित एक व्यंग्यात्मक हिंदी नाटक है, जो यह कल्पना करता है कि अगर मुग़ल बादशाह शाहजहाँ आज के दौर में ज़िंदा होते और सरकारी विभागों, टेंडरों और लालफीताशाही के बीच ताजमहल बनाने की कोशिश करते, तो क्या होता।जब शाहजहाँ प्रेम की याद में मुमताज़ महल के लिए यह स्मारक बनवाने के लिए पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (PWD) के पास जाते हैं, तो वे ख़ुद को कागज़ी कार्यवाही, टेंडर प्रक्रियाओं और भ्रष्ट तरीकों के जाल में उलझा हुआ पाते हैं। कुशल कारीगरों और समर्पण की जगह यह परियोजना सरकारी देरी, धन की कमी और लालची अधिकारियों में फँसकर रह जाती है।तेज़ धार वाले हास्य और चुटीले संवादों के माध्यम से यह नाटक आधुनिक व्यवस्था की अक्षमता, भ्रष्टाचार और प्रक्रियागत बेतुकीपन पर कटाक्ष करता है। जैसे-जैसे टेंडर प्रक्रिया लंबी खिंचती जाती है, शाहजहाँ का सपना बार-बार रुक जाता है और ताजमहल का भव्य ख़्वाब एक बेअंत सरकारी फ़ाइल में बदलकर रह जाता है।यह एक तीखा राजनीतिक और सामाजिक व्यंग्य है, जो इतिहास को आज की हकीक़तों से जोड़ते हुए दर्शकों को हँसाता भी है और हमारे प्रशासनिक ढाँचे की कमियों पर सोचने के लिए भी मजबूर करता है।

दूसरी नाटक की प्रस्तुति विकेंड थिएटर एंड फिल्म दिल्ली द्वारा“जंगली भालू” रहा नाटक मे गुलगुल रानी एक जवान विधवा है जो अपने मर चुके पति की वफ़ादारी में घर के अंदर बंद-सी हो चुकी है। वह दुनिया से बिल्कुल कटाव में रहना चाहती है। उसका पुराना नौकर अशरफ़ बार-बार उसे कहने की कोशिश करता है कि ज़िंदगी रुकती नहीं, पर गुलगुल रानी अपने दुख में ही जीती है। इसी शांति को तोड़ते हुए अचानक एक ग़ुस्से से भरा, कड़क और “जंगली” स्वभाव का आदमी भोला सिंह उसके घर आ जाता है। उसके साथ उसका छोटा असिस्टेंट मंगरू भी होता है। भोला सिंह पैसे लेने आया होता है जो गुलगुल रानी के पति ने उससे उधार लिए थे। गुलगुल रानी कहती है कि वह इस वक़्त कोई पैसा नहीं देगी। भोला सिंह को यह बात बिल्कुल हज़म नहीं होती और घर में ही हंगामा शुरू हो जाता है। भोला सिंह बनाम गुलगुल रानी की ज़बान से लड़ाई, तंज़, ताने और इंसल्ट्स बरसने लगते हैं। गुलगुल रानी की ज़िद और हिम्मत देखकर भोला सिंह और भी गरम हो जाता है। बात इतनी बढ़ जाती है कि वह गुलगुल रानी को ड्यूएल (पिस्तौल से लड़ाई) का चैलेंज दे देता है। सबको झटका लगता है — पर गुलगुल रानी चैलेंज स्वीकार कर लेती है! यह देखकर भोला सिंह के अंदर एक अजीब-सी इज़्ज़त और आकर्षण जागता है।धीरे-धीरे दोनों की लड़ाई एक अलग ही ऊर्जा पैदा करती है — ग़ुस्सा रोमांटिक टेंशन में बदलने लगता है।आख़िर में भोला सिंह अपना दिल खोलकर गुलगुल रानी से प्यार का इज़हार करता है… और सरप्राइज़िंग ट्विस्ट — गुलगुल रानी भी उससे प्यार करने लगती है।

तीसरी प्रस्तुति कला संगम गिरिडीह झारखण्ड द्वारा स्वदेश दीपक लिखित नाटक काल कोठरी रहा। नाटक का कथानक रंगमंच से जुड़े कलाकारों के जीवन संघर्ष पर आधारित है, जिसमें यह दिखाया गया है कि किस प्रकार कलाकार पारिवारिक दबाव, आर्थिक तंगी और व्यवस्था कीa उपेक्षा के बीच अपनी कला को जिन्दा रखता है। नृत्य प्रतियोगिता में निर्णायक अष्टभुजा मिश्र, वाराणसी अशोक शर्मा अलवर राजस्थान रहे। इस अवसर पर हेमंत श्रीवास्तव सहित संस्थान के पदाधिकारी गौरव, मौर्या, सपना बनर्जी, प्रमोद कुमार सिंह, गजराज प्रसाद, कमलेश सोनकर, राज पासवान, रवि गोंड समेत अन्य लोग उपस्थित थे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *